मेरी जड़ तुझ बिन प्यासी है दोस्तों
फिर मिल, नीर डालने आना दोस्तों।
फिर वही पुरानी बात दोहराना दोस्तों,
एक बार सब इकठ्ठा आना दोस्तों।
फिर से वही दरख़्त लाना दोस्तों,
जला महफ़िल आगाज़ करना दोस्तों।
जब भी दिल करे आना दोस्तों,
महफ़िल तुम बिन खाली है दोस्तों।
- गौतम कुमार मिश्रा
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें