अपनेपन की वो भीनी खुशबू जब दूर कही चली जाती है,
यादों की पगडंडी अब जाने क्यूं हाथ बढ़ाये आती है।
जब दूरियों का अहसास कुछ नया नया सा होता है,
मन जाने क्या चाहे कौन से लम्हे संजोता है।
अंजाना है हर लम्हा अब अपनी बातें करता है ,
ना मेरी बातें सुनता है ना मेरी बातें करता है।
एहसासों की डोर सख़्त है जाने क्यूं उलझा रखा है ,
सुलझें हुए रिश्तों से जाने क्यूं अब डर सा लगता है।
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