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डर सा लगता है

Guddo Verma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपनेपन की वो भीनी खुशबू जब दूर कही चली जाती है,
        
                                                    
                            
यादों की पगडंडी अब जाने क्यूं हाथ बढ़ाये आती है।
जब दूरियों का अहसास कुछ नया नया सा होता है,
मन जाने क्या चाहे कौन से लम्हे संजोता है।
अंजाना है हर लम्हा अब अपनी बातें करता है ,
ना मेरी बातें सुनता है ना मेरी बातें करता है।
एहसासों की डोर सख़्त है जाने क्यूं उलझा रखा है ,
सुलझें हुए रिश्तों से जाने क्यूं अब डर सा लगता है।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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