इन्सान घोड़ों की अंधी दौड़ में
दौड़ता चला जा रहा है
वह समझ नहीं पा रहा क्या
छोड़ता चला जा रहा है
समय बीतता जा रहा
परिस्थितियां बदलती जा रहीं
जो साथ रहते थे हमेशा
बस गए और जा कहीं
धीरे धीरे बातों का सिलसिला
खत्म होता चला गया
हम स्वयं में गुम थे
वो भी सिमटता चला गया
वक्त न मिल सका कि हम
मुलाकात कर पाएं
कभी समीप हम बैठें
पुरानी बातें दोहराएं
यह दौड़ थी महँगी
जिसमें हम स्वयं को भूले
समझ में तब हमें आया
हमारे जब कदम झूले
बीता हुआ वह वक्त
अब न लौट पाएगा
दर्द ही दर्द होगा
दिल हमारा पछताएगा
(Priyanka Mishra)
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