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एक आशा

Hari Shankar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बदली उठती जो अंबर में
        
                                                    
                            
आशा जीवन में जगती है
कोकिल मोर पपीहा की धुन से
अनहद की धुन सी बजती है

मुरझायी लता की में उमंग जगे
पिया मिलन होने वाला
ठण्डी मदमाती पवन चली
कलियाँ सोते से जगती हैं

घन घुमड़-घुमड़ बरसे पानी
हर नजर में बहारें आती हैं
कृषक जन के तपित मन में
नयी उमंग सृजन की सजती है

सृजन की सरगम बजती रहे
रहे कण-कण में भाव सृजन
प्रेम पल्लवित हो मन में
सब पीड़ा जग की मिटती है

- हरिशंकर 'हरि'
3 वर्ष पहले
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