बदली उठती जो अंबर में
आशा जीवन में जगती है
कोकिल मोर पपीहा की धुन से
अनहद की धुन सी बजती है
मुरझायी लता की में उमंग जगे
पिया मिलन होने वाला
ठण्डी मदमाती पवन चली
कलियाँ सोते से जगती हैं
घन घुमड़-घुमड़ बरसे पानी
हर नजर में बहारें आती हैं
कृषक जन के तपित मन में
नयी उमंग सृजन की सजती है
सृजन की सरगम बजती रहे
रहे कण-कण में भाव सृजन
प्रेम पल्लवित हो मन में
सब पीड़ा जग की मिटती है
- हरिशंकर 'हरि'