कर्म में जब समर्पण हो
हर कर्म होता पूजा है
जगत को शिवमय जो देखे
ना उसको कोई दूजा है
अंड़ज पिण्डज स्थावर उसमज
उदर तो सब ही भरते है
अद्भुत अजब ज्ञान पाया
मनुज सबसे अजूबा है
जीवन का आधार है जो
उसका-उसको कर अर्पण
झंझट सब मिट जाएगी
बन जाए हर कर्म पूजा है
मैं की सत्ता जब मिटती
जो है वह रह जाता है
ज्ञानी पार उतर जाता
मन मूर्ख नाहक जूझा है
- हरिशंकर 'हरि'