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प्रेम -अमृत

Hari Shankar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी प्रेम की अमृत वर्षा होती थीं
        
                                                    
                            
वह प्रेम का आँगन सिमटने लगा है
रिश्तों की डोरी गुम होने चली है
अपना अपनों से दूर जाने लगा है

प्रेम- स्नेह लेपन लाऊँ कहाँ से
जख्मों की कोई दवा ही ना मिलती
होती कभी जहाँ प्रेम की बातें
नफरत का बादल ही छाने लगा है

बहुत अर्से बीते वो एहसास छूटे
कहाँ खो गयीं प्रेमरस की वो बातें
कहाँ भाव छूटा भावना बह चली है
अमृत में विष कौन मिलाने लगा है

हरिशंकर 'हरि'
3 वर्ष पहले
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