कभी प्रेम की अमृत वर्षा होती थीं
वह प्रेम का आँगन सिमटने लगा है
रिश्तों की डोरी गुम होने चली है
अपना अपनों से दूर जाने लगा है
प्रेम- स्नेह लेपन लाऊँ कहाँ से
जख्मों की कोई दवा ही ना मिलती
होती कभी जहाँ प्रेम की बातें
नफरत का बादल ही छाने लगा है
बहुत अर्से बीते वो एहसास छूटे
कहाँ खो गयीं प्रेमरस की वो बातें
कहाँ भाव छूटा भावना बह चली है
अमृत में विष कौन मिलाने लगा है
हरिशंकर 'हरि'