क्या है दिया क्या लिया इस जहान से
सभी यही रह जाना प्यारे
प्रीत लगा भगवान से
झूठे की प्रीत काम आती नहीं
साथ कोई शय निभाती नहीं
काम क्रोध मद लोभ मोह
ना नाता है अभिमान से
मन भ्रमित है अज्ञान से
सारथी मन इन्द्रियों के घोड़े जुरे
संयम लगाम से ही भव से तरे
एकनिष्ठ बुद्धि विवेक संग
प्रकाशित मन ज्ञान से
निर्बल के बल राम की ही शरणागति
प्रभु की शरण में ही हो पूर्ण गति
बहुत हुआ अब 'हरि' या मन को
लगा ले करुणानिधान से
हरिशंकर 'हरि'