प्रेम
दीवारों का भवन है भंगुर
सनातन एक महल जमाएं
प्रेम के स्तंभों पर टिका हो
भावनाओं की ईंटें लगाएं
दिल कलकल करता बहे
मन की बगिया को सजाएं
ख़ुशियों का आँगन करें तैयार
उम्मीदों की सीढ़ियां लगाएं
हास की प्राचीर तानें
आनन्द के नगीनें जड़ाएं
मृदु रोष हो पर प्रेममय हो
अठखेलियों के रास्ते फैलाएं
प्यार के झरने रहें प्रवाहित
कुछ इस तरह ग़ुस्सा जताएं
मधुर स्वप्नों की रात्रि में
स्नेह की चाँदनी फैलाएं
तुम रूठो तो हम मनाएं
हँस कर जीवन किश्ती चलाएं
तुम हॄदय के पृष्ठ खोलो
हम तुम्हारे मन की बताएं
प्रेम के स्वर चहुँ ओर बिखरें
ज़िन्दगी को ऐसी बाँसुरी बनाएं
© हरीश ममगाई
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