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पहचान

Himanshu Nirbhay

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कौन हो तुम?
        
                                                    
                            
पारस--?
नहीं, मुझे बर्षों छुआ/मसला
पर मैं स्वर्ण न हुयी,
लौह की तरह कठोर-कृष
बनती गई.......!
कौन हो तुम ?
प्रेम--?
नहीं, शरीर के तल से कभी,
तुम्हारा स्पर्श
ऊपर उठा ही नहीं,
जो मुझ तक पहुंचता...... ।
फिर कौन हो तुम ?
याचक...?
कदाचित ! याचक ही रहे होगे,
कुछ न कुछ मांगते रहे सदा
कभी मनुहार से तो कभी बलात
और---मैं देती रही / आत्मा तक ...काट काट कर।
अब जान ही लिया है/ तो जाओ
मेरे पास कुछ भी नही शेष / तुम्हें देने को।
कुछ कुचले अरमान पड़े थे/ उन्हे भी तिरोहित कर दिया
अभी अभी
एक मुक्ति के लिए...

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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