विज्ञापन

जीवन-मंथन

himanshu ranjan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अविरल उच्छ्रन्खल क्षिप्र तरंग
        
                                                    
                            
उज्जवल-फेनित, अल्प-जीवंत लहर
क्षीर-सागर सदृश समस्त सृजन
हर क्षण सतत है जीवन मंथन ।

हर नर है कच्छप अवतरण
पृष्ठ पर किये हुए है वहन
कर्त्तव्य-रुपी महीम मंदराचल,
जीवन-पथ पर है अग्रसर ।

इस भारी-भरकम मंदराचल पर
वासुकी ने घूम-लिपट कर
लगाया है दुरत्यया कर्म-बंधन'
बहुत कठिन है रे अब संतुलन !

वासुकी के पकडे विशाल फन
मद-मंडित है नर का शैतान मन
राग-द्वेष, क्रोध, ईर्ष्या,मोह और लोभ
आलस्य-प्रमाद की है ये कर्मठ अक्षौहिणी फ़ौज !

पूंछ पकडे पुनीत पावन विपक्ष
मानव मन का उज्जवल पक्ष
साहस, दया, आशा, दान, त्याग और विश्वास
उत्साहित ये समूह भी कर रहे है प्रतिकार ।

दिल और दिमाग में भी है अंतर्द्वंद
कभी इस ओर तो कभी वो छोर पसंद
दर्द-तर्क, आवेग-विवेक का ये संग्राम
चलता है निरंतर, करता न विश्राम ।

आरम्भ है जीवन-मंथन
क्या क्षीर-दधि होगा मक्खन ?
अच्छाई- बुराई, ज्ञान-अज्ञान, सद्गुण-व्यसन
और सुख-दुःख की इस क्रीडा का क्या है प्रयोजन ?

किसका करती है ये मनोरंजन ?

कर रही है अनैतिक शैतान दल
वासुकी की विष फुंकार सहन ।
है बुराई का यही कर्म-फल,
अब तो जागृत हो, हे मानव मन!

निष्पक्ष प्रेम-रुपी मलय पवन
से आच्छादित है उभय फलक ।
सकारात्मक रूपांतरण का है ये कारक,
इसी प्रक्रम में जन्मा विघटित हलाहल !

हाहाकार! त्राहिमाम! निज कर्मो का है ये धावा
अवचेतन की गहराई से फूटा ये कैसा लावा ?
कई जन्मों के ये अन्तः सिंचित मारक कर्म-फल
जैसे इस एक जन्म में गए हो उभर ।

गुरु रूप में आते है तब शिव-शंकर,
गट कर जाते है प्राण-घातक हलाहल !
पुनः जारी होता है जब मंथन,
उत्पन्न होता है तब मुक्ति-रुपी अमृत कलश ।

जिसे पीते ही वासुकी की कुंडली
बंधन से मिलती है आज़ादी ।
दुष्पूर इच्छाओं का होता है शमन
क्यूंकि साथ है अब कामधेनु एवं पारिजात वट ।

मुक्त-मन तब उच्छैश्रवस पर सवार,
कर में लिए कौस्तुभ-सज्जित हार
मदन-मोहन को मानता है प्रियतम
ऐरावत करता है पुष्प-वर्षा शुभम ।

वाह रे ! प्रभु तेरा खेल ,
दर्शक-खिलाडी है दोनों एक,
हैं ये कैसा अद्भुत सृजन ?
हर क्षण सतत है जीवन-मंथन !

-हिमांशु रंजन



हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Monika Verma

105 कविताएं

View Profile

hem priya

441 कविताएं

View Profile