अविरल उच्छ्रन्खल क्षिप्र तरंग
उज्जवल-फेनित, अल्प-जीवंत लहर
क्षीर-सागर सदृश समस्त सृजन
हर क्षण सतत है जीवन मंथन ।
हर नर है कच्छप अवतरण
पृष्ठ पर किये हुए है वहन
कर्त्तव्य-रुपी महीम मंदराचल,
जीवन-पथ पर है अग्रसर ।
इस भारी-भरकम मंदराचल पर
वासुकी ने घूम-लिपट कर
लगाया है दुरत्यया कर्म-बंधन'
बहुत कठिन है रे अब संतुलन !
वासुकी के पकडे विशाल फन
मद-मंडित है नर का शैतान मन
राग-द्वेष, क्रोध, ईर्ष्या,मोह और लोभ
आलस्य-प्रमाद की है ये कर्मठ अक्षौहिणी फ़ौज !
पूंछ पकडे पुनीत पावन विपक्ष
मानव मन का उज्जवल पक्ष
साहस, दया, आशा, दान, त्याग और विश्वास
उत्साहित ये समूह भी कर रहे है प्रतिकार ।
दिल और दिमाग में भी है अंतर्द्वंद
कभी इस ओर तो कभी वो छोर पसंद
दर्द-तर्क, आवेग-विवेक का ये संग्राम
चलता है निरंतर, करता न विश्राम ।
आरम्भ है जीवन-मंथन
क्या क्षीर-दधि होगा मक्खन ?
अच्छाई- बुराई, ज्ञान-अज्ञान, सद्गुण-व्यसन
और सुख-दुःख की इस क्रीडा का क्या है प्रयोजन ?
किसका करती है ये मनोरंजन ?
कर रही है अनैतिक शैतान दल
वासुकी की विष फुंकार सहन ।
है बुराई का यही कर्म-फल,
अब तो जागृत हो, हे मानव मन!
निष्पक्ष प्रेम-रुपी मलय पवन
से आच्छादित है उभय फलक ।
सकारात्मक रूपांतरण का है ये कारक,
इसी प्रक्रम में जन्मा विघटित हलाहल !
हाहाकार! त्राहिमाम! निज कर्मो का है ये धावा
अवचेतन की गहराई से फूटा ये कैसा लावा ?
कई जन्मों के ये अन्तः सिंचित मारक कर्म-फल
जैसे इस एक जन्म में गए हो उभर ।
गुरु रूप में आते है तब शिव-शंकर,
गट कर जाते है प्राण-घातक हलाहल !
पुनः जारी होता है जब मंथन,
उत्पन्न होता है तब मुक्ति-रुपी अमृत कलश ।
जिसे पीते ही वासुकी की कुंडली
बंधन से मिलती है आज़ादी ।
दुष्पूर इच्छाओं का होता है शमन
क्यूंकि साथ है अब कामधेनु एवं पारिजात वट ।
मुक्त-मन तब उच्छैश्रवस पर सवार,
कर में लिए कौस्तुभ-सज्जित हार
मदन-मोहन को मानता है प्रियतम
ऐरावत करता है पुष्प-वर्षा शुभम ।
वाह रे ! प्रभु तेरा खेल ,
दर्शक-खिलाडी है दोनों एक,
हैं ये कैसा अद्भुत सृजन ?
हर क्षण सतत है जीवन-मंथन !
-हिमांशु रंजन
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