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ग़ज़ल

Iliyas Chishti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिसने फूलों को किताबों में छिपाया ही नहीं
        
                                                    
                            
उसने फिर लुत्फ़ मोहब्बत का उठाया ही नहीं
फोन पर फोन किया तुमने उठाया ही नहीं
और इल्ज़ाम लगाते हो मनाया जी नहीं
वो तो बेताब रहे पास मिरे आने को
घर पे जब कोई नहीं था तो बुलाया ही नहीं
आशकी में तो मियां सर भी चले जाते हैं
और तुमने तो कभी कुछ भी गवाया ही नहीं
वस्ल (मिलन )का लुत्फ वो पा ही नही सकता इलियास
अपने दिलबर से कभी दूर जो आया ही नहीं।

इलियास चिश्ती
लखीमपुर खीरी

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5 वर्ष पहले
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