चलते चलते आज भी जब
मैं, गिर जाता हूँ रस्ते में
एक साया साया करता है
फिर हाथ रख के कंधे पे
एहसास करा के अपनेपन का
ऊर्जा मुझ में भर जाते हो
बाबूजी मुझे पता है अब भी
तुम मुझसे मिलने आते हो
चले गए जग से सच है,पर
मुझ में तुम अब भी बसते हो
मेरी हार पे रोते हो तुम भी
मेरी जीत पे तुम भी हँसते हो
हर शाम भी है सोना मुझ में
हर सुबह मुझ में जग जाते हो
बाबूजी मुझे पता है अब भी
तुम मुझसे मिलने आते हो
एक सॉल सिरहाने रख के जब
मैं रात को सोया करता हूँ
सपने में नींद जो खुलती है
तुम्हारी चरणों में होया करता हूँ
मेरी उम्मीद मे तुम भी शामिल हो
हौसला मेरा बढ़ाते हो
बाबूजी मुझे पता है अब भी
तुम मुझसे मिलने आते हो
© इंदर भोले नाथ
बागी बलिया उत्तर प्रदेश