"ड़र" यह कोरा एक शब्द नही,
भावो की सिर्फ एक भंगिमा नही।
तुझे खोने का, तेरा होने का।
दरकते रिश्तो का,सिसकते अहसासो का।।
जीवन के रहस्यो का, कल्पना के विकारो का।
सूखते अश्रु का, टूटती जीवटता का।।
"ड़र" यह कोरा एक शब्द नही,
भावो की सिर्फ एक भंगिमा नही।
शंका और विस्मय का बोध कराता हार के दानव से,
वजह, बेवजह यह खोखला करता मानव को।
टूटना, खोना और असफलता की विभीषिका से
साक्षात कराता चिंतित जन मानस को।।
"ड़र" यह कोरा एक शब्द नही,
भावो की सिर्फ एक भंगिमा नही।