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दोहे - कवि

Kailash Vashishth

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कविवर ऐसा लीखिये,
        
                                                    
                            
अंतर मन  छूजाय।
दर्दी को मरहम लगे,
राह नयी दिख लाय।।

कलम कहे मे लिख रही,
कागज भी इतराय।
रोशन मे स्याही करूं, 
कवि तेरी क्या राय।।

कहती, कवि से लेखनी,
घमंड  तुझे क्यूँ आय,
लिख तो रचना, मे रही,
तू काहे इतराय ?

कवि बोले,पर पीड़ से,
नैन नीर आजाय,
कवि का धर्म निभा रहा,
जो मुझ से बन पाय।

ना तो मे कुछ लिख सकूँ,
ना मेरी औकात्,
जी थोड़ा हल्का करूँ
पाकर तेरा सांथ।

कैलाश वशिष्ठ "के सी"

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6 वर्ष पहले
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