यहाँ जिंदगी में सभी को गिले हैं।
न जाने क्यूँ मुझसे खफ़ा काफ़िले हैं।
सफ़र में चली थीं, ये तनहाइयां भी।
बड़ी दूर तक तो अँधेरे मिले हैं।
भला कुछ जमाने को कहते भी कैसे।
सदी से मिरे लब किसी ने सिले हैं।
जो गुलशन कभी था,वो सहरा बना है।
गुलो की जगह अब तो कांटे खिले हैं।
"कमल" अब बना ले,नया गुलसितां तू।
मुहब्बत में चलते यही सिलसिले हैं।
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