हे प्राणप्रिये हे मतवाली
हे पत्नीजी हे घरवाली
प्रेमपुष्प से लदी हुई हो
झुकी हुई कोमल डाली
हे मृगनयनी हे रूपवती
हो लज्जावश सिकुड़ी सिमटी
तुम प्रेम-भाव की मूरत हो
अब तुम तो मेरी जरूरत हो
तुम अन्नपूर्णा हो मेरी
मैं क्या तारीफ करूँ तेरी
मैं जो भी बोलूंँ वो कम है
तेरे होने से ही हम हैं
मैं काम करूंँ बाहर जाकर
तुम खाना रोज बनाती हो
सुख चैन ढ़ूंँढ़कर मैं लाऊंँ
तुम घर को रोज सजाती हो
मैं हूंँ ताली तुम ताला हो
मैं मोती तो तुम माला हो
बिन तेरे तो मैं कुछ भी नहीं
बिन तेरे मेरा अस्तित्व नहीं
मैं हूंँ कविता तुम गान प्रिये
मैं सिर्फ देह तुम प्राण प्रिये
तुम हो तो सारा विश्व मेरा
बिन तेरे क्या अस्तित्व मेरा
तुम मुझसे हो मैं तुमसे हूंँ
बिन तेरे सोचो मैं क्या हूंँ
मुस्कान तेरी मेरा साहस
मैं लोहा हूंँ तुम हो पारस
कहने को तो है देह अलग
पर कहांँ अलग मैं हूंँ तुमसे
न तुम बिन मैं न मुझ बिन तुम
मैं सोच रहा यूंँ ही गुमसुम
मैं सोच रहा यूंँ ही गुमसुम
मैं कहांँ तेरे बिन पूरा हूंँ
तुम से ही है पहचान मेरी
बिन तेरे प्रिये अधूरा हूंँl
-Kaushal kishore singh
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