विज्ञापन

लोग

कवी विनोद

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चेहरे पर मुखवटे नए, लगाएं फिरते हैं लोग यहां
        
                                                    
                            
ख़ुद को भी पहचानने, आईना देखते हैं लोग यहां

एक दूसरे के झोपड़े, जलाते हैं लोग यहां
इन्सान की कब्र यहां, खोदते हैं इन्सान ही यहां

मंदिर, मस्जिद ही, बनाते हैं लोग यहां
सुख की तलाश में, मर जाते हैं लोग यहां

अपने ही अपनों को, गिराते हैं लोग यहां
अंत समय अपनों को ही, उठाते हैं लोग यहां

गलती कर, मुखर जाते हैं लोग यहां
इल्जाम किसी दूसरे पर, लगा जाते हैं लोग यहां

अपनों से ही खफा हो जाते हैं लोग यहां
ख़ुद ही ख़ुद से बेवफाई कर जाते हैं लोग यहां

बुरे वक्त जो साथ, छोड़ जाते हैं लोग यहां
वहीं घटिया जीने की, सिख देते हैं लोग यहां

एक- दूसरे की घृणा, करते हैं लोग यहां
एक -दूसरे के ही, काम आते हैं लोग यहां

- कवि विनोद मोहबे
सातगांव, गोंदिया 
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

hem priya

444 कविताएं

View Profile

SANDEEP PANDEY

80 कविताएं

View Profile

Arjun Prabhat

37 कविताएं

View Profile