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सोच रहा हूँ

Kavi Devansh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सोच रहा हूँ अपने गीतों में तेरी कोई बात लिखूं ,
        
                                                    
                            
कॉलेज वाली याद लिखूँ या पहली मुलाकात लिखूँ

छोटी छोटी छेड़-छाड़ से तेरा मुझे सताना ।
रोज चटपटे मैसेज करके मुझको खूब हँसाना।
मुझे देखकर क्लास में तेरा मेज के नीचे छिपना ,
बात बात पर झगड़ा करके फिर तेरा इतराना।।

तेरी भोली मुस्कानों की वो प्यारी सौगात लिखूं ।
सोच रहा हूँ अपने गीतों में तेरी कोई बात लिखूं।।

कालेज से आकर भी तेरी यादों के सँग रहना ।
जाते जाते हाथ हिला कर कल मिलते हैं कहना।।
और सुबह फिर सँग सहेलियों के इठलाते आना,
मेरी नाराजी को भी बस हँसते हँसते सहना ।।

याद में तेरी तारे गिनते गिनते काटी रात लिखूं।
सोच रहा हूँ अपने गीतों में तेरी कोई बात लिखूं।।

जैसे पास परीक्षा के दिन आते जाते थे।
गाँव चले जाओगे सोच के हम घबराते थे।।
तेरी राह देखने को वो घर से जल्द निकलकर,
आगे कभी, कभी पीछे पीछे तेरे आते थे।।

गर्मी की छुट्टी में कैसे उबले थे जज़्बात लिखूँ ।
सोच रहा हूँ अपने गीतों में तेरी कोई बात लिखुँ।।

कवि देवांश उज्जवल
संयोजक सुनहरी कलम मंच
बदायूँ (उ०प्र०)
3 वर्ष पहले
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