कब तक आखिर आंसू
अपनी आंखों मे ही रोकुंगा
कब तक मै यूँ ही हंसकर
खुद को गम मे झोकुंगा
जब तक मुझमे साहस है
मैं खुश होकर मुस्काऊँगा
कब तक आखिर संयम से
मैं आंसू अपने रोकुंगा
कौन मिलेगा मुझको, मेरा
मैं जीत जीत कर हारा हूँ
किस्मत , मुझसे रूठी है
और मै किस्मत का मारा हूँ
कब तक यूँ ही जलकर के
रौशन मैं खुद को देखूँगा
कब तक मै यूँ ही हंसकर
खुद को गम मे झोकुंगा
- शिवाजी बाजपेयी "नवीन"
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