ना जानूँ किस और चल पड़ा हूँ मैं ,
रास्ता चल रहा है या खड़ा हूँ मैं ,
भेद मुझे ना कोई इस समय अच्छे या बुरे का ,
इस कदर निकल पड़ा हूँ मैं ,
ना जाने कब अपने पैरों पर खड़ा हो गया ,
ना जाने कब अपनों का साथ खो गया ,
ना जानता हूँ वो रातें कहाँ गई ,
मैं जिन रातों की नींद में हमेशा के लिए सो गया ,
वक्त की बारिशें सब पर बरसी ,
फिर उसका असर सिर्फ़ मुझ पर क्यों दिखता है ,
आज अपने आस पास देखकर समझ आ ही गया आख़िर ,
जो दिखता है वही बिकता है,
शेरों की आड़ में कई साँप पाले बैठा हूँ ,
हर एक का वेश अच्छे से याद है मुझे ,
किस किस ने कहा ज़ख़्म दिया अच्छे से याद है मुझे ,
कई हमदर्द भी मिले कई हमउम्र भी ,
कई ग़ैर भी मिले कई वैर भी ,
सज़ाएँ भी कई मिली वफ़ाएँ भी कई मिलीं,
कई मिली गालियाँ दुआएँ भी कई मिली…..