असर ये कैसा है जो हम पर हो रहा
कभी होश में हैं कभी होश खो रहा
संभालते बहुत हैं खुद को हम यहां
बिन पिये लग रहा कि नशा हो रहा
दौड़ने लगी ये ज़िन्दगी उसकी खुशी
कोई बात है ही नहीं उस पे भी हंसी
शक्ल-सूरतें दिख रहीं खिली खिली
झूमते जहां की तस्वीरें मन में बसी
घर आ रहे मेहमानों से हुयी गर्मजोशी
दूर झटक दी सबने करीब से ख़ामोशी
यकीन हमें हो गया है बीता कठिन दौर
ये नशा जो चढ़ा ये बन रहा मदहोशी
©® कृष्ण कान्त बडोनी