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मदहोशी

Krishna Kant Badoni

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            असर ये कैसा है जो हम पर हो रहा
        
                                                    
                            
कभी होश में हैं कभी होश खो रहा
संभालते बहुत हैं खुद को हम यहां
बिन पिये लग रहा कि नशा हो रहा

दौड़ने लगी ये ज़िन्दगी उसकी खुशी
कोई बात है ही नहीं उस पे भी हंसी
शक्ल-सूरतें दिख रहीं खिली खिली
झूमते जहां की तस्वीरें मन में बसी

घर आ रहे मेहमानों से हुयी गर्मजोशी
दूर झटक दी सबने करीब से ख़ामोशी
यकीन हमें हो गया है बीता कठिन दौर
ये नशा जो चढ़ा ये बन रहा मदहोशी

©® कृष्ण कान्त बडोनी
3 वर्ष पहले
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