माँ
माँ के आँचल तले
मैंने कई सपने बुने
प्यारे से , नन्हे से लगते थे
माँ के आँचल तले।
जब मैं सो जाती थी,
मुझे गोद में उठाती थी।
आँचल की छाया मुझे देकर
खुद धूप में रह जाती थी।
खुद काँटो पर चलकर वो
फूलो की चादर बिछाती थी।
खुद दर्द सहकर भी
खुशियों का मरहम मुझे लगाती थी।
मैं जब बड़ी हो जाऊँगी
माँ को उसका सम्मान दिलाऊँगी।
नाम उसका कर रोशन
एक महान माँ की बेटी कहलाऊंगी।
मैं बड़ी होकर
अपनी माँ जैसा बनना चाहती हूँ।
ज़िन्दगी में और कुछ नही
बस अपनी माँ को चाहती हूँ।
-भव्या शर्मा
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