बूंदें बरस रही है आसमां से
अपने ही संगीत की धुन में
गुनगुनाती हुई जो
एहसास करा रही है मुझे
सावन की बरसती घटाओं में
थिरकते उन कदमों के आहटों की
जब तुम इठलाती इतराती
मदहोश झूम जाती थी।
जुल्फों से पानी झटकाती हुई बरसती बूंदों के संगीत में
बस यही पल तो मेरे थे
जिनका एहसास
मैं आज भी करता हूं
इन बूंदों के संगीत के सहारे
जो टपकती हैं घनघोर घटाओं से
जिनमें तुम समाई हुई हो
© राजपूत गोकुल मौरा
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
मौलिक स्वरचित रचना
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