मैं पत्थर सा मजबूत,
ह्रदय सा कोमल हूं।
मैं पतझड़ सा मजबूर,
रात्रि सा ओझल हूं।
मैं उपवन सा फूल,
मैदान-ए-जंग का शूल हूं।
मैं हसरत सा जुनून,
करने को मजबूर हूं।
- बाबा
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें