किसे दिख रहा है यहाँ, कृषकों का संघर्ष।
मना रहे हैं शान से, लोग सभी नव वर्ष॥
मेहनत की मत पूछिए, करते दिन अरु रात।
पग-पग पर खाते रहे, हालातों से मात॥
सहकर इतने जख़्म भी, करते हैं हम काम।
हमे कभी मिलते नहीं, हैं फसलों के दाम॥
ठोकर सहते हैं कठिन, बनकर के हम मर्ष।
मना रहे हैं शान से, लोग सभी नव वर्ष॥
दुनियाँ को भोजन खिला, करते रहे प्रसन्न।
माटी मोल खरीदते, व्यापारी भी अन्न॥
बोझ झेलकर कर्ज़ का, करें फसल उत्पाद।
मँहगे दामों में मिले, हमें बीज अरु खाद॥
संतापो में जी रहे, दूर भागता हर्ष।
मना रहे हैं शान से, लोग सभी नव वर्ष॥
शस्य-श्यामला गीत बस, गाते रहिए आप।
अब तो सारे देश में, करते कृषक विलाप॥
मतलब तो बस वोट से, रखती है सरकार।
करें सियासत के सभी, बाग सिर्फ़ ग़ुलजार॥
कृषक बिना होगा नहीं, भारत का उत्कर्ष।
मना रहे हैं शान से, लोग सभी नव वर्ष॥
राजेश पाली 'सर्वप्रिय'
बसुरिया, नरसिंहपुर म.प्र.
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।