रति के दिन वो बड़े सुहाने,
चाहत के थे नए अफ़साने
हृदय में थे उमंग भरे,
गाते थे नित नए तराने
आकांक्षा थी उन्हें पाने की,
हृदय में उन्हें बसाने की।
ख्वाब भर वो दिन था मेरा,
होता जो संग साथ तेरा
अर्पण कर दूं चाहत में,
मन की यह अभिलाषा थी
हृदय में अरमान था एक,
पास में तेरे आने की।
कल बिता कैसे! रब जाने,
कल के लिए तड़पते हैं
सौन्दर्य का तेरे दर्शन हो,
पाने को जिसे तरसते हैं
है; यह दृढ़संकल्प मेरा,
अपना तुम्हें बनाने की।
कैसे भी दिन तो जाए गुजर!
रजनी ना काटी जाती है
शशि को तेरा दर्पण समझ,
अंखियां ताका करती हैं
आ मिल जा प्रियतम से तू,
करके किसी बहाने से।
-सुनील कुमार
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