बहुत नहीं तो बहुत कुछ तो कर सकता हूं,
हिदायतें अक्सर तोड़ने वालों को समझा सकता हूं।
समाज क्या है कैसे बनता और कैसे बनेगा?
यह राजनीति नहीं तय कर सकती अनुसंधानकर्ता हूं।
भले ही तुम न समझ पाओ मेरे जज्बात़,
फिर भी उम्र भर देता रहूंगा तुम्हें आवाज़।
कुछ मत अपने नहीं अपनों के होते हैं,
जिन्हें मैं भूलकर भी नहीं दे सकता आघात।
भले ही तेरी सौगात अच्छी है,
मगर फिर भी मेरी बात अच्छी है।
द्रश्यों की आत्मा ही परिभाषा है,
मन से ज्यादा वाणी भाग्य विधाता है।
साथ कौन है यह बात नहीं है,
वक्त पर कौन है यह बात सही है।
याद रखना रास्ते अक्सर पथरीले ही हुआ करते हैं,
और रास्तों पे चलने वाले भी जोशीले ही हुआ करते हैं।
संजीव रामपाल मिश्र"बाबा"
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