देखो माँ हम कितने मजबूर हैं।
अभी हम घर से दूर हैं।
पाथर पत्थर जोड़ कर मकान बनाया है
तेरे बिना ये घर कहाँ बन पाया है।
दीवाली पर देखो ,मेरा बंगला जगमगाया है,।
पर माँ देरे बिना ,ये मन कहां खिल पाया है।
देखो हम कितने मजबूर हैं
अभी हम घर से दूर हैं,
आई है होली ,
हर तरफ रंग बिखरे हैं,
पहले प्यार के बिना ,रंग भी उखड़े उखड़े हैं।
खुले आसमान में फिर पंतग उड़ाने को जी चाहता है
माँ एक बार घर आने को जी चाहता है
दुनिया की दौड़ धूप मेेें ,
हम कितने मजबूर हैं
अभी हम घर से दूर हैं।
ललिता जन्मेजय सिंह
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।