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अभी हम घर से दूर हैं

Lalita Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            देखो माँ हम कितने मजबूर हैं।
        
                                                    
                            
अभी हम घर से दूर हैं।
पाथर पत्थर जोड़ कर मकान बनाया है
तेरे बिना ये घर कहाँ बन पाया है।
दीवाली पर देखो ,मेरा बंगला जगमगाया है,।
पर माँ देरे बिना ,ये मन कहां खिल पाया है।
देखो हम कितने मजबूर हैं
अभी हम घर से दूर हैं,
आई है होली ,
हर तरफ रंग बिखरे हैं,
पहले प्यार के बिना ,रंग भी उखड़े उखड़े हैं।
खुले आसमान में फिर पंतग उड़ाने को जी चाहता है
माँ एक बार घर आने को जी चाहता है
दुनिया की दौड़ धूप मेेें ,
हम कितने मजबूर हैं
अभी हम घर से दूर हैं।
ललिता जन्मेजय सिंह



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