बचपन में लाख हजारों में बस एक ही चेहरा भाता है
मां से पीट करके भी बालक मां के पास ही जाता है
मुझको विद्यालय भेज के मां वक्त कै आंका करती है
है अभी नही आया लल्ला रस्ते में ही झांका करती है
माँ मुझे सुला के सोती है पर मुझसे पहले जगती है
बस्ता ड्रेस और टिफिन की चिंता से नहीं थकती है
मां देवकी है कौशल्या है यशोदा का अनुपम प्यार है
रामायण वेद पुराण है मां भगवद् गीता का सार है
हो स्वामीभक्ती पर संकट मां पन्ना धाय बन जाती है
निज पुत्र पृष्ठ पे बांध के लक्ष्मीबाई युद्ध पे जाती है
शिवबा में स्वराज की चिंगारी जीजामाता ही जगाती है
एक अल्पायु बाजी को पेशवा राधाबाई ही बनाती है
मां अर्पण है मां तर्पण है मां ईश्वर का उपहार है
करूणा साहस वात्सल्य का मां ही जीवित आधार है
हमे गलती पर भी डाट दे तो मां एकांत में रोती है
हमको देती ताजी रोटी खुद बासी खाकर सोती है
इतने तप त्याग के बाद भी मां आखिर क्या पाती है
बेटे हो जाए लायक तो फिर मां वृद्धाश्रम जाती है
आजकी मेरी युवा पीढ़ी आधुनिकता स्वार्थ मेेंं झूल गई
करवाचौथ उसके याद रहा और व्रत छठ्ठी का भूल गई
यदि हम संकल्प करे कोई मां वृद्धाश्रम ना जाए
जिस मां ने जन्म दिया उसकी आंखों में आंसू ना आए
है विश्वास शुभम पाठक का ये धरा सुखी हो जाएगी
हम विश्व गुरू होगे भारत सोने की चिड़िया कहलाएगी
शुभम पाठक श्वेतभ
तिलोई
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