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मां........

शुभम पाठक

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बचपन में लाख हजारों में बस एक ही चेहरा भाता है
        
                                                    
                            
मां से पीट करके भी बालक मां के पास ही जाता है
मुझको विद्यालय भेज के मां वक्त कै आंका करती है
है अभी नही आया लल्ला रस्ते में ही झांका करती है
माँ मुझे सुला के सोती है पर मुझसे पहले जगती है
बस्ता ड्रेस और टिफिन की चिंता से नहीं थकती है
मां देवकी है कौशल्या है यशोदा का अनुपम प्यार है
रामायण वेद पुराण है मां भगवद् गीता का सार है
हो स्वामीभक्ती पर संकट मां पन्ना धाय बन जाती है
निज पुत्र पृष्ठ पे बांध के लक्ष्मीबाई युद्ध पे जाती है
शिवबा में स्वराज की चिंगारी जीजामाता ही जगाती है
एक अल्पायु बाजी को पेशवा राधाबाई ही बनाती है
मां अर्पण है मां तर्पण है मां ईश्वर का उपहार है
करूणा साहस वात्सल्य का मां ही जीवित आधार है
हमे गलती पर भी डाट दे तो मां एकांत में रोती है
हमको देती ताजी रोटी खुद बासी खाकर सोती है
इतने तप त्याग के बाद भी मां आखिर क्या पाती है
बेटे हो जाए लायक तो फिर मां वृद्धाश्रम जाती है
आजकी मेरी युवा पीढ़ी आधुनिकता स्वार्थ मेेंं झूल गई
करवाचौथ उसके याद रहा और व्रत छठ्ठी का भूल गई
यदि हम संकल्प करे कोई मां वृद्धाश्रम ना जाए
जिस मां ने जन्म दिया उसकी आंखों में आंसू ना आए
है विश्वास शुभम पाठक का ये धरा सुखी हो जाएगी
हम विश्व गुरू होगे भारत सोने की चिड़िया कहलाएगी

शुभम पाठक श्वेतभ
तिलोई

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7 वर्ष पहले
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