बूढ़ी आंखे
सीने में सौ गम लेकिन, चुप रहती है बूढ़ी आंखे।
सह लेती हर गम को फिर भी कुछ न कहती बूढ़ी आंखे ।।
जिसकी छोटी सी हंसी की खातिर, अपनी खुशियीं की बाली चढ़ा दी।
आज उसी के दरस की खातिर तिल-तिल जलती है बूढ़ी आंखे ।।
अपने सीने से लहू पिलाकर जिस पौधे को बृक्ष बनाया।
आज उसी की छाव की खातिर तरस रही है बूढ़ी आंखे ।।
Maddy
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