बिछड़े हुए एक ज़माना हो चला है
चलो आज मिलने की चाहत फ़िर जगाई जाएं
चलो मिलकर साज कोई नया छेड़ा जाएं
चलो गीत कोई मिलकर नया लिखा जाएं
चलो मिलन का कोई पन्ना ऐसा खोला जाए
चलो जो हमें हसीन लम्हों की याद दिलाएं
चलो मिलकर चाय की चुस्कियां ली जाएं
चलो सिगरेट के धुए के छल्ले बनाए जाएं
चलो दौड़ते भागते बसे पकड़ी जाएं
चलो बिना टिकट बसों में सफ़र किया जाएं
चलो दोस्तों का टिफिन फ़िर गायब किया जाएं
चलो बारिश के पानी में फिर भीगा जाए
बिछड़े हुए ज़माना हो चला है
चलो आज मिलने की चाहत फ़िर लगाई जाए ll
अपराजिता.....