वैसे तो अनुशासन अच्छा है ,
दहलीज-ऐ सीमा ना तोड़ो तो अच्छा है|
धधक रहा जो पाबक-तलाक,
मत तीन करो तो अच्छा है ।।
मैं अटल-सी निंदा करता हूं ,
उसके मस्तिष्क की श्रद्धा को ।
जिसमें नर को सर्वस्व दिया ,
पर नारी को अधिकार नहीं ।।
है प्रतिभा तो दिखने दो ,
उनको भी खुलकर जीने दो ।
यह हीन भावना ऊंच-नीच ,
तुम दूर रखो तो अच्छा है ।।
तुम धर्म समझते हो जिसको ,
बो भारी भूल तुम्हारी है ।
यह घोर पाप है तुमसे सबका ,
रब की नहीं बलिहारी है ।।
यदि रब रूठा तो डूबोगे ,
फिर किस्मत से तुम जूझोगे ।
रब की सम-दृष्टि सदा सब पर ,
मत बदलो तो ही अच्छा है ।।
जीते-जी वह खुद को मार ना ले ,
फिर मातृशक्ति संघार ना ले ।
अब सोच समझ प्रताड़ो तुम ,
कहीं फिर विष्णु अवतार ना ले ।।
धन्यवाद
मधुकर सिंह चौहान
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