एक पहलू है ज़िंदगी का
कि काेई नहीं है किसी का
आज तक हम जिनके लिये तड़पते रहे
आैर एक थे वो जो हमें तड़पाते रहे
एक पहलू है जिंदगी का
कि काेई नहीं है किसी का
आज जिनकी सूरत भुलाये नहीं भूलता हूँ
जीता हूँ कैसे ये मैं ही जानता हूँ
एक पहलू है जिंदगी का
कि काेई नहीं है किसी का
क्या कहूं तुमसे मैं,क्या तुमसे बयान करूं
तुम रहे जहां भी मगर रहे ख़ुश बस यही फ़रियाद बार-बार रब से करूं
एक पहलू है ज़िंदगी का
कि काेई नहीं है किसी का
लेकिन सच कहूं ऐ मीत मेरे एक पहलू सी पहेली ज़िंदगी बन गई है
जिसे न सुलझने की आदत-सी बन गई है
- महेश
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