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एक पहेली

Mahesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक पहलू है ज़िंदगी का
        
                                                    
                            
कि काेई नहीं है किसी का

आज तक हम जिनके लिये तड़पते रहे
आैर एक थे वो जो हमें तड़पाते रहे

एक पहलू है जिंदगी का
कि काेई नहीं है किसी का

आज जिनकी सूरत भुलाये नहीं भूलता हूँ
जीता हूँ कैसे ये मैं ही जानता हूँ

एक पहलू है जिंदगी का
कि काेई नहीं है किसी का

क्या कहूं तुमसे मैं,क्या तुमसे बयान करूं
तुम रहे जहां भी मगर रहे ख़ुश बस यही फ़रियाद बार-बार रब से करूं

एक पहलू है ज़िंदगी का
कि काेई नहीं है किसी का

लेकिन सच कहूं ऐ मीत मेरे एक पहलू सी पहेली ज़िंदगी बन गई है
जिसे न सुलझने की आदत-सी बन गई है

- महेश

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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