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मैं एक परिंदा हूँ

रजनीश स्वच्छन्द

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं एक परिंदा हूँ, खुद से शर्मिंदा हूँ।
        
                                                    
                            
पंखों पे दबिश भी है, मैं फिर भी ज़िंदा हूँ।

उड़ने को जग सारा, मिल जाये फिर क्या ग़म,
पर हैं कतरे गए, मैं फिर भी ज़िंदा हूँ।

एक आस लिए मन में, इस जग में आया था,
औंधे मुंह पटका गया, मैं फिर भी जिंदा हूँ।

कुछ बाग मिले ऐसे, हर शाख पे उल्लू था,
अपनों से चोट लगी, मैं फिर भी जिंदा हूँ।

रोता हूँ, हंसता हूँ, बस अपने में ही रहता हूँ,
ग़म की चादर लंबी है, मैं फिर भी जिंदा हूँ।

फूलों का दर्द सहा, कांटों की चुभन चखी,
बाणों से भेदा गया, मैं फिर भी जिंदा हूँ।

कोई बात नहीं ऐसी, जो दर्द मेरा कह जाए,
हर बात चुभी दिल को, मैं फिर भी जिंदा हूँ।

हर रात रही काली, थी सुबह नक़ाब लिए,
आंखों में अंधेरा था, मैं फिर भी जिंदा हूँ।

सब अपनी राह गए, मेरा ना कोई रहा,
हर जुल्म रहा सहता, मैं फिर भी जिंदा हूँ।

किसको भनक मेरी, सब अपनी धुन में रहे,
अश्कों का समंदर था, मैं फिर भी जिंदा हूँ।

कुनबे से मुहब्बत की, हर तिनका प्यारा था,
अरमां के मोती बिखरे थे, मैं फिर भी जिंदा हूँ।

नाता जग ने तोड़ा है, मैं फिर भी जिंदा हूँ,
मैं एक परिंदा हूँ, खुद से शर्मिदा हूँ।।

©रजनीश "स्वछंद"

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