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तुम्हारे पास हूं

Manish Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            
एक टक तस्वीर को
निहारती रही
सुनहरे पलो को याद कर
मानों खोया हुआ स्पर्श
तन रोमांचित कर रहा हो
भीगे गेंसुओं की उलझनों को
ऊंगलियों से आहिस्ताआहिस्ता
सुलझाना
सुखद आसक्त था
उसके पास होने का
अहसास कराती रही
जिजीविषा थी ऐसी कि
प्रेम के सुगन्ध को
आत्मसात करती रही
जो दूर था पर पास होने का
आभास करती रही
अपने आराध्य को पाने की
ललक में तपस्या
शायद एकाकीपन थी
जिसमें पूर्ण मानसिक
समर्पण था
उर में समाहित आकर्षण
हर तस्वीर में
दिखती उसकी काया
संतृप्त प्रेम की
कहानी बारम्बार कहती रही
कि मैं तुम्हारे पास हूं
तुम्हारे पास ।

 
2 वर्ष पहले
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