एक टक तस्वीर को
निहारती रही
सुनहरे पलो को याद कर
मानों खोया हुआ स्पर्श
तन रोमांचित कर रहा हो
भीगे गेंसुओं की उलझनों को
ऊंगलियों से आहिस्ताआहिस्ता
सुलझाना
सुखद आसक्त था
उसके पास होने का
अहसास कराती रही
जिजीविषा थी ऐसी कि
प्रेम के सुगन्ध को
आत्मसात करती रही
जो दूर था पर पास होने का
आभास करती रही
अपने आराध्य को पाने की
ललक में तपस्या
शायद एकाकीपन थी
जिसमें पूर्ण मानसिक
समर्पण था
उर में समाहित आकर्षण
हर तस्वीर में
दिखती उसकी काया
संतृप्त प्रेम की
कहानी बारम्बार कहती रही
कि मैं तुम्हारे पास हूं
तुम्हारे पास ।