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विरह

Manish Patel

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आंखें बोल रही है, तेरी
        
                                                    
                            
नज़रें डोल रही है
कुछ तो बात है ऐसा मन में, तेरे
जो होंठो पर आ न रहा ।

विरह है एक ऐसी चोट दिल पे
रोया भी न जाए
हंसा भी न जाए
दर्द, दिल की
बस आंखों से बहता जाए ।

बीते पलों के नजारे भी
विरह की वेदना में
दिल की चौखट पर
दम तोड़ देते हैं
ग़म के आंसू में
बस बह जाते हैं ।

सुबह होगी, यह रात भी बितेगा
अगर तुम विरह के बन्धन को तोड़ देते हो
आने वाला कल को अपने सपनों में जोड़ लेते हो
सपने अपने होते हैं
जीने का आधार बनाते हैं।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले
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