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बेरोजगारी

Manish Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर रोज कहीं घोर अंधेरो में ना जाने कितने ख्वाब सजा रहा होगा
        
                                                    
                            
वो एक उम्मीद, चलो झूठी ही सही पर अपनी मायूस सी आँखों मे हर रोज बसा रहा होगा।
खुद जो मुसाफिर बना बैठा है दर्द की दुनिया का,
कहीं कोई बदनसीब न कह दे, बैठ कर सबके साथ झूठा ही सही पर मुस्कुरा रहा होगा।
पता उसे भी है के जिम्मेदारियां है उसके कंधो पर,
और कही ये जिम्मेदारियां ही बोझ ना बन जाये शायद,
इसलिए ही अपनी हर खुशियों को दरकिनार कर तिल तिल उन्ही के लिए मर रहा होगा।
मत पूछो ठिकाना के कौन है वो बदनसीब और कहाँ रहता हैं
बेरोजगार है साहब...देखो जाकर शायद किसी बंद कमरे में रो रहा होगा।
3 वर्ष पहले
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