भीड़तंत्र
भीड़ का चेहरा नहीं,
साकार रूप है यही,
चल देते पीछे सभी,
पहचान पर कोई नहीं,
भीड़ बन चल रहे सभी,
मशीन बन संतुष्ट यहीं,
विवेक बुद्धि चुप रही,
सोच अब कुछ भी नहीं,
कितनी मुट्ठी ,कितने हाथ,
चेहरों पर डाले नकाब,
रूप कर रहा हाहाकार,
उग्र विनाश और विकराल,
सड़कों पर हो रहा न्याय,
बेहाल व्यवस्था, चुप समाज,
मानव पतन या विकास,
सोचें सभी मिलकर आज,
मनीषा सहाय
स्वरचित,
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।