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दिग्भ्रमित

Manju Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिग्भ्रमित सा सूरज फिर
        
                                                    
                            
दिवस भर फिरता रहा
अप्रतिम मिलन की चाह में
पहर पहर पिघलता रहा

चाहत क्यूँ है ज्ञात नहीं पर
निरूद्देश्य कुछ भी नहीं
इसी आस को लिए मन में
जीवन भर भटकता रहा।

मं शर्मा (रज़ा)
3 वर्ष पहले
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