यदि मैं प्रधानमंत्री होता
यदि मैं सबसे अमर होता
यदि मैं सबसे बलशाली होता
गौण लगते हैं अब।
यदि मैं भगवान, इष्ट, आराध्य होता
तब भी मैं
किसी उपासक, भक्त, प्रेमी के
आह्वान पर
उसके स्थान या समय पर
आधे अधूरे मन से ही जाता
यदि वहां पर बेटी न होती
याकि बेटी का यथोचित
सम्मान न होता।
सोचिए मत कि यह क्या तर्क है
जो निसंतान, अविवाहित है
या कि उनके पुत्र ही हैं
बेटियां यहीं हैं और बहुतायत में हैं।
आप बस बेटी से स्नेह कीजिए
उसका सत्कार, सम्मान कीजिए
यदि मैं भगवान न भी हुआ
तो जो भी भगवान, रब्ब है
पूरे मन से मिलने आएगा।