कब तक रहेगी ये धरती यूँ ही काँपती ?
है ये पापियों के पाप से त्रस्त, शैतानों के भय से है हाँफती,
हो गये हैं जब इसके जाये ही इतने स्वार्थी,
हो गई है अब बेबस अपनों को ही लीलती ।
क्या थक गई है बोझ ढोते अपनों की ये धरणी ?
हो गया है भान इसे ,समझते हैं सब बस नाम की जननी,
पहचान गई है मुखौटे के पीछे छुपे चेहरे की निशानी,
क्या करे हो पूत कपूत कुमाता न होती जननी ?
करती रही ये अपने सपूतो के जागने की प्रतीक्षा,
करते रहे हम इसके करूण क्रंदन मिश्रित पुकार की उपेक्षा,
कर लिया है धारण इसने आज अपना रौद्र रूप,
अब भी वक्त है जागें हम गहरी तंद्रा से वरना न जाने क्या हो फलःस्वरूप ।
कभी धड.कती है तो कभी है खिसकती,
बेटे जो न सुने रहे माँ कब तक बिलखती,
माँ के आँखों में आँसू कभी अच्छी नहीं होती,
बन के नदी एक दिन ये हमें ही डुबोती ।
रहते ऊपर जिसके हम पनाह लिये,
क्यों न देखें जीकर उसके उद्धार के लिये ?
सोचा हमेंशा हमने अपने लिये,
क्यों न सोचें हम दो पल अपने श्यामला के लिये ?
माँ है मान ही जाएगी,
अपने बच्चों की तड.प कहाँ सह पाएगी ?
क्षमा करेगी भूल अपनें बच्चों की ,
ये आक्रोश तो है बस पल दो पल की ।
-मनोज कु. झा (अप्रैल 30, 2015)
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