ये कोई अल्फाज़ नहीं है,
ये अभिशाप है
जो हर कदमों पे,
आह्टों में मुकरती है
ज़िन्दगी लाश लगती है
जब यहाँ - वहाँ कंकड़ पत्थर से गुजरो,
दब जाती है,
उंगलियाँ दाँतों तले,
धूपो के रंगरलियों पे
आसां नहीं ये गरीबी, मौत से भी बेहत्तर है
अमीरों के कोख में,
पलती है नोटों की गड्डियाँ
गड्डियों में छिपे हैं उसके भगवान
और वही गरीबों के कोख नहीं है
उसके भगवान आँसुओं में छिपे होते हैं,
मौन छुपाए दर्द को,
दर्द छुपाए कौन,
जो सबका रस्ता यही से,
फिर क्यूँ बैठा मौन,
- मनोज कुमार