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राम केवट मिलाप

Manoj Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            राह देखती आँख यह, अब सुध लो श्रीराम।
        
                                                    
                            
सरयू तट पर बैठ कर, भजता केवट नाम।।

करुण वचन सुन भक्त की, आये प्रभु भी दौड़।
मिलने केवट से गए, राज-पाठ को छौड़।।

एक झलक प्रभु राम की, दे आँखों को ठंड।
वही हाल था दास का, व्याकुल हुआ प्रचंड।।

नदी तीर पर देख कर, केवट करे विचार।
आज मुझे तो मिल गया, सपनों का संसार।।

आज भाग्य भी साथ है, मिला मुझे वरदान।
दर्शन देने सदन में, आए खुद भगवान।।

सोच रहा केवट यही, आज दिवस है खास।
बोल पड़े तब राम जी, जाकर उसके पास।।

सिया लखन भी साथ है, तुमसे इतनी अर्ज।
नौका लेकर तुम चलो, पूर्ण करो निज फर्ज।।

तुमसे इतनी विनय है, हमे लगा दो पार।
जीवन भर का ऋण रहे, सिर पर रहे उधार।।

सुन कर वाणी राम की, केवट पकड़े पैर।
मैं हूँ सेवक आपका, मुझे न समझें गैर।।

मगर हृदय में बात है, जिसका मिले जवाब।
खुद आएँ प्रभु द्वार पर, कभी न देखा ख्वाब।।

एक बात बतलाय दो, जग के तारणहार।
करते भव से पार जो, उन्हें कराऊँ पार।।

सुन केवट की बात को, अधर खिली मुस्कान।
बोले तब मुस्काय के, हे केवट विद्वान।।

विकट परिस्थिति में मिले, तुमको जिसका साथ।
धन्यवाद दो ईश को, समझो उसको नाथ।।

इतना सुन केवट कहे, सुनलो मेरी बात।
आप जगत के नाथ हो, नहीं और कुछ ज्ञात।

पार लगा दूँ आप को, पहले मेरी बात।
दर्शन पाने के लिए, तड़पा कितनी रात।।

इतनी रातों का भला, देगा कौन हिसाब।
सुन कर चुप थे राम जी, दिया न उसे जवाब।।

केवट बोला प्रेम से, मिले कृपा की छाँव।
जाने से पहले मुझे, धोने दें निज पाँव।।

यही गुज़ारिश आप से, करता है ये दास।
वह नर तो धनवान है, हरि हो जिसके पास।।

धन दौलत कुछ था नहीं, ना ही कंचन देह।
खींचे आए राम जी, सच्चा था जब स्नेह।।

- मनोज कुमार पुरोहित
अलिपुरद्वार, पश्चिम बंगाल
2 वर्ष पहले
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