दिलों से बंधें ये कच्चे धागे हैं
तन्हाई के लम्हें, वक्त से आगे हैं
आज की नींदें हैं,कल के सपने हैं
पर अतीत के साए,आँखों में जागे हैं
ख्वाब, ख्यालों से भी तेज़ भागे हैं
ये आसमाँ ज़मीं सा क्यों लागे है?
एक तलब है,शायद बेमतलब है
जिसकी डोर ये कच्चे धागे हैं
'मैं' और 'हम' यहाँ दो अभागे हैं
वक्त से ज़्यादा वक्त की माँगें है
जो जुड़ के भी ना जुड़ पा रहें
वो कच्चे रिश्तों के कच्चे धागे हैं
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