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रुखसत

Mon Bhattacharya

Mere Alfaz
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                            रुखसत
        
                                                    
                            

अपनी जिंदगी से मुझे रुखशत किया,
और के आगोश से मेरा कत्ल किया ।
इन आँसुओं से अब क्या हासिल,
जब समंदर में ही गोता लगा लिया ।
सितम को मैंने भी कब का रुखशत कर दिया ,
और तुम कहते हो की रोया नहीं करते ।
अनकही यादों को सम्भाल कर रखना,
जो तेरे जीने का सहारा बनेंगी ।

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"ख्वाहिशें"
जो कभी आई तेरी सदा,
धड़कनें बईमान हो जाती है।
करूँ लाख कोशिशें मगर ,
दिल अनजान बन जाती है।
लाख समझाया इन्हें हर-तरह,
ये न जाने क्यूँ,हद से गुजर जाते है।
क्या करूँ अब सोचता है ये "मन",
देखूँ आईने में गर,तेराअक्श बन जाते है।
यादों के आईने में ,अब धूल की परतें है,
"मन" नहीं कहता उसमे,फिर से कभी झांक ले।
चल बहुत हुआ सिलसिला व्यर्थ का ये ,
ऐ मन! एकांत की दुनिया अब तलाश ले ।
आँसूओ की रेतीली-चादर में,दर्द सो रहा,
सुन मन! गमों को कफ़न की अब जरूरत क्या।
आशियाना छोटा ही सही,बेशूमार मोहब्बत की ख्वाहिशें थी,
उसका दिल ही छोटा निकला,क्या जरूरत मन छोटा करने की ।

"मन".[बावरी]

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8 वर्ष पहले
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