चमकते रेत की प्यास
तपती हवा की प्यास,,
बर्फीले टुकड़े की प्यास,
नीले बादलों की प्यास,
सूखे पेड़ों की प्यास,
कड़कती बिजली की प्यास,
फटी हुई धरती की प्यास,
रात के अंधेरों में भटकती
जुगनुओं की प्यास,
कौन बुझा सकता है
कभी सोचा है किसी ने बेरहम मजलूम
और गरीबों की प्यास तबतक
नहीं बुझ सकती जब कुदरत के इन
खूबसूरत कायनात की प्यास नहीं बुझती,
हम यूं ही बूंद बूंद बर्बाद किये फिरते हैं
कभी हलक के बाहर तो कभी हलक के अंदर
बिना जरूरत यूं ही जाया न करो
पानी की बूंद न बिना बात का गुस्सा,
वक्त आने पर क्या पता दोनों कम पड़ जाए