सोच बदलो
अजूबा नहीं वे...
प्रकृति की एक छोटी - सी भूल है
बस... और कुछ नहीं
हमारी - तुम्हारी तरह वे भी एक इंसान हैं
अलग नहीं कोई पहचान है ?
प्राचीन ग्रंथों में भी जिक्र है
उन्हें ग्रहस्थों की रहती बड़ी फिक्र है
इसीलिए हमेशा खुशी के मौके पर
देती हैं - देते हैं बधाइयां
तालियां बजा - बजा कर...
महज एक छोटी - सी कमी के लिए
हम उन्हें इंसानी समाज से दूर नहीं कर सकते
बड़े - बड़े महापुरुष हुए
जो ग्रहस्थी से दूर रहे।
ग्रहस्थी बसाने के कई तरीके हैं
और आज का जाग्रत समाज
उन तरीकों को अपना भी रहा है
इंसानियत का परचम लहरा भी रहा है |
वे हास्य का विषय नहीं,
उपहास का विषय नहीं
मर्दानगी सीने में होती है
किसी अंग विशेष में नहीं...
सोच बदलो - मानसिकता खुद-ब-खुद बदल जायेगी |
वे गालियों का कोई कारण नहीं
एक हट्टा - कट्टा आदमी भी
घटना - दुर्घटना से उनकी श्रेणी में आ सकता है
फिर भला वे ही सिर्फ वे ही
गालियों के हकदार क्यों...?
मत भूलो -
हृदय उनके सीने में भी धड़कता है
दु:ख - दर्द उनको भी महसूस होता है
जो तुम कर सकते हो
उसे वे भी कर सकते हैं,
हर क्षेत्र में अपने झंडे गाड़ सकते हैं
सोच बदलो - मानसिकता खुद-ब-खुद बदल जायेगी |
- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
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