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अश्कों के बहते नीर को मैं यूं ही पी जाता हूं

Mythought Mythought

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अश्कों के बहते नीर को मैं यूं ही पी जाता हूं,
        
                                                    
                            
ख़ुद ही रो लेता हूं जी भर कर,
और ख़ुद ही चुप हो जाता हूं।

खुदको ढूंढने कहां-कहां नहीं जाता हूं ,
अपनों में ही पाता हूं, खुद को और
अपनों में ही खो जाता हूं।

अपना सच्चा साथी इन्हें ही मानता हूं,
खुद ही गीत लिखता हूं और
खुद ही गुनगुनाता हूं।

मेरी मोहब्बत को देख कर किसी और के साथ,
इतना ही कर पाता हूं, खुद की ही चिता सज़ा कर,
खुद ही लेट जाता हूं।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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