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भ्रमित

Nag Mani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भ्रमित
        
                                                    
                            

टुकड़ा - टुकड़ा चाँद सा चेहरा,
टुकड़ों में है धुप की छाया,
बीते कल की बात नहीं यह,
अभी-अभी तो नींद खुली है,
जाग सवेरा तन्द्रिल नयना,
टुकड़ा - टुकड़ा चाँद सा चेहरा,
बादल के ओटों से छुप के,
मन के आंगन में बस के,
बैठा है वह चेहरा अब भी,
फिर भी लगता भ्रम सा क्योंकर,
मोनो चेहरा टुकड़ा- टुकड़ा,
भारी है पर आज ही मौसम,
संशय की कोई बात नहीं है,
बरसों का वह निर्मित चेहरा,
चाँद तुम्हारा पूरा चेहरा,
अभी हुआ वह टुकड़ा - टुकड़ा,
टुकड़ा - टुकड़ा चाँद सा चेहरा।

नाग मणी


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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