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मजबूरी

Nalini Chakraborty

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्या हम खुद को, इतना समर्थ भी ना पाते हैं
        
                                                    
                            
क्यों अक्सर कमज़ोरी को, नाम मजबूरी का दे जाते हैं।।

माना कि कभी वक्त तो कभी हालात, हावी हो जाते हैं
कभी अपनों और गैरों के बीच, अक्सर खो हम खुद को जाते हैं।।
खो भी दे खुद को तो क्या हासिल, वो मुक़ाम कर पाते हैं
क्यों अक्सर कमज़ोरी को, नाम मजबूरी का दे जाते हैं।।

कई दफा खुशियां सिर्फ, अपनों की सर्वोपरि रख जाते हैं
नाम कुर्बानी का देकर, वजूद अपना मिटा जाते हैं।।
क्या ताउम्र हम अंतरात्मा संग, ये छल कर पाते हैं
क्यों अक्सर कमज़ोरी को, नाम मजबूरी का दे जाते हैं

जो था नहीं जो मिलेगा नहीं,क्या उसे कभी पा पाते हैं
क्यों डरे रास्तों से किस राह में, पत्थर नहीं आते हैं।।
दोष देकर हालातों को, लड़ने से पहले ही हार मान जाते हैं
क्यों अक्सर कमज़ोरी को, नाम मजबूरी का दे जाते हैं ।।

हारते हैं हम तभी, जब खुद से हार मान जाते हैं
यूँ तो कोई मजबूरी नहीं, कारणवश जिसके वजूद अपना खो जाते हैं।।
मजबूरी को ना वजह बनाओ कमज़ोरी की,
जीतने वाले इसे ही अपनी ताकत बना जाते हैं।।

क्या हम खुद को इतना समर्थ भी ना पाते हैं,
क्यों अक्सर कमज़ोरी को नाम मजबूरी का दे जाते हैं।।

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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